*हरियाणा कांग्रेस की बड़ी चुनौती नायब सरकार पर हमला करना नहीं / नेताओ का संगठन में विश्वास और एकजुटता होना जरूरी है*
राणा ओबराय
राष्ट्रीय खोज/भारतीय न्यूज,
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*हरियाणा कांग्रेस की बड़ी चुनौती नायब सरकार पर हमला करना नहीं / नेताओ का संगठन में विश्वास और एकजुटता होना जरूरी है*
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चंडीगढ़ ;- हरियाणा कांग्रेस के सामने संगठन को एकजुट करने और जमीन पर मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करने की बड़ी चुनौती खड़ी है। पार्टी के भीतर लंबे समय से चली आ रही खेमेबाजी अब संगठनात्मक कमजोरी के रूप में दिखाई देने लगी है। हाल के घटनाक्रमों में भी अलग-अलग नेताओं और गुटों के बीच मतभेद सामने आए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मजबूत जनाधार और सरकार के खिलाफ मुद्दे होने के बावजूद कांग्रेस उन्हें प्रभावी राजनीतिक अभियान में क्यों नहीं बदल पा रही। 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद संगठनात्मक रणनीति और नेतृत्व को लेकर आत्ममंथन की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है। जुलाई 2026 में हुई प्रदेश कांग्रेस की बैठक में भी गुटबाजी, चुनावी हार, अनुशासन और संगठन को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
*नेताओं के अलग-अलग खेमे, कार्यकर्ताओं में असमंजस*
हरियाणा कांग्रेस की राजनीति में वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग प्रभाव क्षेत्रों और समर्थक समूहों की चर्चा लंबे समय से होती रही है। मार्च 2026 के राज्यसभा चुनाव के दौरान भी वरिष्ठ नेताओं के बीच तनाव और क्रॉस-वोटिंग के आरोपों ने पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े किए।
हिसार में कांग्रेस के शहरी और ग्रामीण जिला संगठनों द्वारा अलग-अलग प्रदर्शन करना भी पार्टी के अंदर मौजूद संगठनात्मक दूरी का उदाहरण बना। हाल में हिसार अर्बन जिला कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफे ने भी प्रदेश संगठन में चल रही खींचतान की चर्चा को हवा दी।
*सिर्फ बैठकें नहीं, जमीन पर एकजुटता जरूरी*
कांग्रेस नेतृत्व अब संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की दिशा में अभियान चला रहा है। प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर बैठकों और कार्यकर्ता कार्यक्रमों के जरिए जमीनी संगठन को सक्रिय करने की कोशिश की जा रही है। राजनीतिक जानकारों के लिए असली सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपने नेताओं को एक मंच पर लाकर कार्यकर्ताओं में भरोसा पैदा कर पाएगी? पार्टी के सामने चुनौती केवल सरकार का विरोध करने की नहीं, बल्कि एक स्पष्ट नेतृत्व, मजबूत संगठन और साझा रणनीति तैयार करने की भी है। यदि गुटबाजी पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ और नेतृत्व का संदेश नीचे तक एकजुट होकर नहीं पहुंचा, तो कांग्रेस के लिए आगामी राजनीतिक मुकाबले में अपनी स्थिति मजबूत करना मुश्किल हो सकता है। इसके विपरीत, यदि वरिष्ठ नेता व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर संगठन को प्राथमिकता देते हैं, तो पार्टी अपने मौजूदा जनाधार को फिर से राजनीतिक ताकत में बदल सकती है।
निष्कर्ष: हरियाणा कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष में रहते हुए सरकार पर हमला करना नहीं, बल्कि पहले अपने संगठन के भीतर विश्वास और एकजुटता कायम करना है।

