*प्रेक्टिस करने के लिए वकील को बार एसोसिएशन का मेंबर होना जरूरी नही / हाईकोर्ट ने BCI के नियम को किया सीमित / एसोसिएशन की सदस्यता लेना स्वैच्छिक*
राणा ओबराय
राष्ट्रीय खोज/भारतीय न्यूज,
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*प्रेक्टिस करने के लिए वकील को बार एसोसिएशन का मेंबर होना जरूरी नही / हाईकोर्ट ने BCI के नियम को किया सीमित / एसोसिएशन की सदस्यता लेना स्वैच्छिक*
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तेलंगाना हाईकोर्ट ने ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015’ के नियम 6 को सीमित करते हुए कहा कि वकीलों के लिए बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य नहीं की जा सकती और सदस्यता न होने पर किसी वकील को कानून की प्रैक्टिस करने से रोका या अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
*जस्टिस एन. तुकारामजी की सिंगल जज बेंच ने कहा*
“नियम 6 की व्याख्या या उसे लागू इस तरह से नहीं किया जा सकता कि बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य हो जाए या प्रैक्टिस करने के अधिकार पर रेगुलेटरी कंट्रोल गैर-वैधानिक निकायों को सौंप दिया जाए। इस हद तक कोई भी जबरदस्ती वाला या अनिवार्य अर्थ निकालना ‘एडवोकेट्स एक्ट, 1961’ के अधिकार क्षेत्र से बाहर (अल्ट्रा वायर्स) होगा और भारत के संविधान के आर्टिकल 19(1)(c) और 19(1)(g) का उल्लंघन होगा। इसके अलावा, एक रेगुलेटरी प्रावधान के तौर पर नियम 6 वकील को केवल एक विकल्प देता है और कल्याण और पहचान के वैध उद्देश्य को पूरा करता है। इस तरह से व्याख्या करने पर यह नियम ‘एक्ट, 1961’ के दायरे में (इंट्रा वायर्स) और संवैधानिक रूप से वैध होगा।”
कोर्ट वकील विजय गोपाल द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015’ के नियम 6 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि नियम 6 असल में वकीलों को बार एसोसिएशन का सदस्य बनने के लिए मजबूर करता है और बार-बार सर्टिफिकेशन और वेरिफिकेशन की ऐसी ज़रूरतें थोपता है, जिनकी कल्पना ‘एडवोकेट्स एक्ट, 1961’ में नहीं की गई। उन्होंने तर्क दिया कि एक्ट की धारा 22, 30 और 33 के तहत एनरोल्ड वकील को कानून की प्रैक्टिस करने का जो वैधानिक अधिकार मिला है, उसे किसी बार एसोसिएशन की अनिवार्य सदस्यता के अधीन नहीं किया जा सकता। यह भी तर्क दिया गया कि विवादित नियम संविधान के आर्टिकल 19(1)(c) और 19(1)(g) का उल्लंघन करता है, क्योंकि एसोसिएशन बनाने की आज़ादी में एसोसिएशन न बनाने का अधिकार भी शामिल है।
*’गौरव कुमार बनाम भारत संघ’* मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि डेलीगेटेड लेजिस्लेशन (सौंपे गए कानून बनाने की शक्ति) से ऐसी ठोस ज़िम्मेदारियां नहीं बनाई जा सकतीं, जिनकी कल्पना मूल कानून (पैरेंट स्टैच्यूट) में नहीं की गई। याचिकाकर्ता ने ‘दमयंती नारंग बनाम भारत संघ’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि अनिवार्य रूप से किसी संगठन या एसोसिएशन का सदस्य बनना अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत मिली आज़ादी का उल्लंघन है।
बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया और तेलंगाना बार काउंसिल ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि नियम 6, एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 49(1)(ah) के तहत बनाया गया एक रेगुलेटरी (नियमन संबंधी) उपाय है। उन्होंने कहा कि इस प्रावधान का मकसद असली वकीलों की पहचान करना और वकीलों के लिए कल्याणकारी योजनाओं को आसान बनाना था। प्रतिवादियों के अनुसार, नियम 6 बार एसोसिएशन की सदस्यता को अनिवार्य नहीं बनाता है; बल्कि, यह वकील को विकल्प देता है कि या तो वह किसी मान्यता प्राप्त बार एसोसिएशन में शामिल हो या फिर स्टेट बार काउंसिल को सदस्यता न लेने के बारे में सूचित करे और बताए कि कल्याणकारी लाभ कैसे प्राप्त किए जाएंगे।
एडवोकेट्स एक्ट की व्यवस्था की जांच करते हुए कोर्ट ने पाया कि धारा 29, 30 और 33 वकीलों को ही कानून की प्रैक्टिस करने के हकदार लोगों के वर्ग के रूप में मान्यता देती हैं और यह एक्ट स्पष्ट रूप से बार एसोसिएशन की सदस्यता को उस अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए ज़रूरी शर्त नहीं बनाता है।
साथ ही कोर्ट ने देखा कि धारा 49(1)(ah) बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया को ऐसी शर्तें तय करने का अधिकार देती है, जिनके तहत कोई वकील कानून की प्रैक्टिस कर सकता है। इसलिए नियम 6 की वैधता इस बात पर निर्भर करती थी कि क्या यह केवल एक्ट के मकसद के अनुरूप रेगुलेटरी शर्तें लगाता है या मूल कानून से परे जाकर कोई ठोस दायित्व बनाता है।
नियम 6 को पूरी तरह से देखने के बाद कोर्ट ने कहा कि प्रावधान को सीधे तौर पर पढ़ने से पता चलता है कि बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य नहीं है। इसके बजाय, नियम केवल वकील को विकल्प देता है कि या तो वह बार एसोसिएशन में शामिल हो या फिर कल्याणकारी लाभ प्राप्त करने के मकसद से स्टेट बार काउंसिल को सदस्यता न लेने के बारे में सूचित करे।
कोर्ट ने कहा, “नियम 6 को सीधे तौर पर पढ़ने से पता चलता है कि बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य नहीं है। यह प्रावधान केवल वकील को विकल्प देता है कि या तो वह बार एसोसिएशन में शामिल हो या फिर इसके विकल्प के तौर पर कल्याणकारी लाभ प्राप्त करने के मकसद से स्टेट बार काउंसिल को ऐसी सदस्यता न लेने के बारे में सूचित करे।”
कोर्ट ने आगे कहा कि इस तरह से व्याख्या करने पर यह नियम एडवोकेट्स एक्ट की धारा 6, 7 और 49(1)(ah) के दायरे में आता है और “असली वकीलों की पहचान करने और कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में मदद करने” के जायज़ मकसद को पूरा करता है। जस्टिस तुकारामजी ने तेलंगाना हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के उस फ़ैसले का भी हवाला दिया, जिसमें ‘सर्टिफ़िकेट ऑफ़ प्रैक्टिस’ की ज़रूरत को सही ठहराया गया। डिवीज़न बेंच ने कहा कि इस तरह के सर्टिफ़िकेशन का मकसद यह पक्का करना है कि वकील असल में संबंधित कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहा है। सिर्फ़ इसलिए कि इससे असुविधा होती है, इस ज़रूरत को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। अहम बात यह है कि कोर्ट ने साफ़ किया कि वकीलों के प्रैक्टिस करने के अधिकार पर रेगुलेटरी अधिकार सीधे या परोक्ष रूप से बार एसोसिएशन को नहीं दिया जा सकता। नियम 6 की कोई भी ऐसी व्याख्या जो सदस्यता को अनिवार्य बनाती हो या प्रैक्टिस करने के अधिकार को गैर-कानूनी निकायों के नियंत्रण में रखती हो, वह असंवैधानिक होगी।
इसके अनुसार, कोर्ट ने नियम 6 की व्याख्या करते हुए कहा:
1. बार एसोसिएशन की सदस्यता पूरी तरह से स्वैच्छिक होगी।
2. सदस्यता न होने पर किसी वकील को वकालत करने से रोका या प्रतिबंधित नहीं किया जाएगा।
3. बार एसोसिएशन प्रैक्टिस करने के अधिकार पर कोई निर्णायक या रेगुलेटरी नियंत्रण नहीं रखेंगे।
इसके बाद कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को सभी राज्य बार काउंसिलों को उचित स्पष्टीकरण जारी करने का निर्देश दिया और कहा कि सर्टिफिकेशन और वेरिफिकेशन की ज़रूरतें केवल कल्याणकारी उपायों के लिए रेगुलेटरी तंत्र के रूप में काम करनी चाहिए, न कि वकील के प्रैक्टिस करने के अधिकार को प्रभावित करने वाली बाध्यकारी शर्तों के रूप में।
इस तरह रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।

