इनैलो नेता प्रो संपत सिंह ने कहा बिजली वितरण कंपनियों द्वारा दायर की गई याचिकाओं का उद्देश्य / जनता पर बोझ और कॉरपोरेट को लाभ पहुचाना*
राणा ओबराय
राष्ट्रीय खोज/भारतीय न्यूज,
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इनैलो नेता प्रो संपत सिंह ने कहा बिजली वितरण कंपनियों द्वारा दायर की गई याचिकाओं का उद्देश्य / जनता पर बोझ और कॉरपोरेट को लाभ पहुचाना*
*एक ओर बिजली कंपनियां जनता से कैरींग कॉस्ट वसूलने की मांग कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वर्ष 2021 से उपभोक्ताओं के दबाकर रखे गए 2,263 करोड़ रुपए के नकारात्मक एफएसए अधिशेष पर पूरी तरह मौन हैं*
*यह अत्यंत विडंबनापूर्ण स्थिति है कि सरकार स्वयं अपने बिजली बिलों का भुगतान नहीं करती, लेकिन आम घरेलू उपभोक्ताओं से उसकी कीमत वसूलना चाहती है*
*हरियाणा की जनता को यह जानने का अधिकार है कि जब 84 लाख परिवार सरकार द्वारा कानूनी रूप से देय सब्सिडी की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब 1,300 करोड़ रूपए चुपचाप एक निजी कॉरपोरेट समूह के खातों में कैसे पहुँचा दिए गए*
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चंडीगढ़ ;- हरियाणा के पूर्व मंत्री एवं इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के राष्ट्रीय संरक्षक प्रो संपत सिंह ने शुक्रवार को चंडीगढ़ स्थित पार्टी मुख्यालय पर प्रेस वार्ता कर हरियाणा सरकार के बिजली क्षेत्र के संचालन पर तीखा और तथ्यात्मक हमला बोलते हुए कहा कि राज्य की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) द्वारा हालिया दायर की गई याचिकाएँ नौकरशाही दुस्साहस का एक शर्मनाक उदाहरण है। जिनका उद्देश्य मंत्री स्तरीय लापरवाही की कीमत जनता पर थोपना और कॉरपोरेट को लाभ पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि वीरवार 14 मई को हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग (एचईआरसी) में हुई सुनवाई के दौरान बिजली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) अपने वकीलों की पूरी फौज के साथ पहुँचीं थी। लेकिन हमारे द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्यों के समक्ष उनके पास कोई जवाब नहीं था। उन्होंने कहा कि उनकी याचिकाओं की स्टीक और अटूट कानूनी संरचना के सामने विपक्षी पक्ष पूरी तरह मौन हो गया। जिसके चलते आयोग को अगली सुनवाई 10 जून 2026 के लिए निर्धारित करनी पड़ी। प्रो. सम्पत सिंह ने बताया कि यह पूरा मामला संस्थागत भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं की कई परतों को उजागर करता है। बिजली वितरण कंपनियां नवंबर 2025 के 1,134 करोड़ रुपए के एफपीपीएस वृद्धि दावे को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही हैं, जो केवल एक कंपनी जीएमआर कमलांगा से संबंधित है। यदि अन्य मामलों को भी शामिल किया जाए तो यह राशि हजारों करोड़ रुपये तक पहुँच सकती है। उन्होंने कहा कि विनियमन 68.1(3) के तहत निर्धारित एन+2 माह की अनिवार्य अवधि में कार्रवाई न करने के कारण यह दावा कानूनी रूप से समाप्त हो चुका है। इसके साथ ही उन्होंने अक्टूबर 2025 में सिक्किम ऊर्जा लिमिटेड (ग्रीनको) को किए गए 1,300 करोड़ रुपए के भुगतान का खुलासा करते हुए कहा कि यह भुगतान गोपनीय और संदिग्ध तत्परता के साथ किया गया। जिसमें न केवल मुख्यमंत्री को दरकिनार किया गया बल्कि ऊर्जा मंत्री अनिल विज तक को अंधेरे में रखा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक ओर बिजली कंपनियाँ जनता से कैरींग कॉस्ट वसूलने की मांग कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वर्ष 2021 से दबाकर रखे गए 2,263 करोड़ रुपए के नकारात्मक एफएसए अधिशेष पर पूरी तरह मौन हैं। जबकि यह राशि उपभोक्ताओं की है और इसे उपभोक्ताओं को लौटाया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से सिक्किम ऊर्जा लिमिटेड (ग्रीनको) को किए गए 1,300 करोड़ रुपए के भुगतान की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए कहा कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि इस भुगतान को किसने अधिकृत किया, किस प्रक्रिया के तहत किया गया, किन शर्तों पर किया गया और इतनी असामान्य जल्दबाजी क्यों दिखाई गई।
प्रो. सिंह ने कहा कि विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 65 स्पष्ट रूप से कहती है कि सब्सिडी का भुगतान अग्रिम रूप से किया जाएगा। इसके बावजूद हरियाणा सरकार द्वारा 1,971 करोड़ रुपए की सब्सिडी जारी नहीं की गई, जिसके कारण बिजली वितरण कंपनियों को अपनी नकदी आवश्यकता पूरी करने के लिए व्यावसायिक ऋण लेने पड़े। उन्होंने बताया कि लगभग 22 लाख उपभोक्ताओं, जिनमें सरकारी विभाग भी शामिल हैं, पर लगभग 8,200 करोड़ रुपए की बकाया राशि है। यह अत्यंत विडंबनापूर्ण स्थिति है कि सरकार स्वयं अपने बिजली बिलों का भुगतान नहीं करती, लेकिन आम घरेलू उपभोक्ताओं से उसकी कीमत वसूलना चाहती है।
प्रो. सम्पत सिंह ने कहा कि 31 मार्च 2026 तक बिजली वितरण कंपनियों का कुल बकाया ऋण 22,132 करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है, जबकि 31 मार्च 2025 तक दोनों कंपनियों का संचयी घाटा 27,915 करोड़ रूपए था। यह किसी बाहरी संकट का परिणाम नहीं, बल्कि सुधारों में देरी और जानबूझकर किए गए कुप्रबंधन की देन है। उन्होंने कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इस मामले की जांच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से कराई जानी चाहिए। हरियाणा की जनता को यह जानने का अधिकार है कि जब 84 लाख परिवार सरकार द्वारा कानूनी रूप से देय सब्सिडी की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब 1,300 करोड़ रुपए चुपचाप एक निजी कॉरपोरेट समूह के खातों में कैसे पहुँचा दिए गए।

