*बारह साल के टूटे वादे: कैसे मोदी सरकार ने भारत की अर्थव्यवस्था को भीतर से बर्बाद किया ;- महासचिव राजीव शर्मा*
राणा ओबराय
राष्ट्रीय खोज/भारतीय न्यूज,
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*बारह साल के टूटे वादे: कैसे मोदी सरकार ने भारत की अर्थव्यवस्था को भीतर से बर्बाद किया ;- महासचिव राजीव शर्मा*
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इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने देखा था कि किस तरह मोदी सरकार ने भारत की सामरिक स्वायत्तता को गिरवी रख दिया, चाहे वह चाबहार पर कायरतापूर्ण समर्पण हो, अमेरिकी दबाव में सस्ता ईरानी तेल आयात जारी न रख पाने की विफलता हो, या वाशिंगटन के साथ किया गया एकतरफा व्यापार समझौता हो। ये तो बस कुछ उदाहरण हैं कि किस तरह मोदी सरकार ने बार-बार देश के राष्ट्रीय हितों से समझौता किया है। इस दूसरी कड़ी में हम भीतर की ओर उन आत्मघाती आर्थिक ज़ख्मों की ओर रुख करते हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी ने बारह वर्षों में आम भारतीयों को दिए हैं। यह ज़ख्म किसी विदेशी ताकत ने नहीं, बल्कि पूरी तरह से प्रधानमंत्री की अपनी बनाई नीतियों ने दिए हैं। अगर पहली कड़ी विदेशों में प्रधानमंत्री के समर्पण की कहानी थी, तो यह अपने ही घर और नागरिकों को कमज़ोर करने की कहानी है।
*नोट-बंदी की तबाही*
8 नवंबर 2016 की रात, प्रधानमंत्री मोदी ने बिना रिज़र्व बैंक से सलाह लिए, बिना संसद में कोई बहस कराए, और बिना बैंकिंग व्यवस्था को इस भारी झटके के लिए तैयार किए, मनमाने ढंग से नोटबंदी की घोषणा कर दी। नोटबंदी इस मूर्खतापूर्ण धारणा पर आधारित थी कि अधिकांश नकद रुपया “काला धन” होता है। इसने आम नागरिकों को बेवजह भारी पीड़ा दी।
राज्यसभा में बोलते हुए डॉ. मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को “संगठित लूट और “क़ानूनी डकैती” करार देते हुए,चेतावनी दी कि सरकार के इस अनुचित फैसले से जीडीपी में कम से कम दो प्रतिशत अंकों की गिरावट आ सकती है। नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुँचाया, विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र को तबाह कर दिया। छोटे और मझोले व्यापारी, कारोबारी और किसान बर्बादी के कगार पर पहुँच गए, जबकि करोड़ों भारतीयों की नौकरियाँ और आजीविका रातों-रात छिन गई।
*जीएसटी का फियास्को*
मुश्किल से आठ महीने बाद, जब नोटबंदी के ज़ख्म भरने भी शुरू नहीं हुए थे, मोदी सरकार ने जुलाई 2017 को जल्दबाज़ी में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कानून लागू कर दिया। इस कानून को जल्दबाज़ी में बनाया गया और बिना पर्याप्त संघीय परामर्श के देश पर थोप दिया गया, और तकनीकी ढाँचा तैयार होने से पहले ही लागूध कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि टैक्स स्लैबों के कारण इसकी अनुपालन व्यवस्था इतनी जटिल बन गई कि छोटे और मझोले उद्यम और व्यापारी इसके बोझ तले दब गए। जीएसटी ने असंगठित अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को खत्म कर दिया, जिससे वे केंद्र सरकार के सामने भिखारी बनकर रह गए। ईमानदार व्यापारी अनुपालन के बोझ तले दब गए, जबकि बेईमान टेक्स चोर नए नए रास्ते निकाल कर धन कमाते रहे।
*मोदी सरकार की कोविड प्रबंधन में अक्षम्य भूलें*
भारत की दोनों कोविड लहरों को संभालने में नरेंद्र मोदी का रवैया शायद दुनिया में सबसे खराब रहा। सरकार की अपनी लापरवाही ने ही महामारी को फैलाने का काम किया: मोदी ने संक्रमण बढ़ने के बावजूद बड़े-बड़े चुनावी रैलियों और धार्मिक समागमों, जिनमें कुंभ मेले की भीड़ भी शामिल थी, की अनुमति दी। उनकी प्रतिक्रिया भी उतनी ही लापरवाह रही। “ताली, थाली बजाओ” के नाटक से लेकर, 24 मार्च 2020 को बिना किसी सूचना के दुनिया के सबसे सख्त लॉकडाउन की घोषणा कर डाली। फिर कोविड वैक्सीन और दवाइयों का निर्यात जारी रखा, जबकि भारतीय इन दवाइयों की कमी से मर रहे थे।
अप्रैल-मई 2021 की भयावह दूसरी लहर के दौरान, अस्पतालों में ऑक्सीजन खत्म हो गई, गंगा में लाशें बहती रहीं या श्मशान घाटों में जगह न होने के कारण उसके किनारे सामूहिक कब्रों में दफनाई गईं, और एक साल से अधिक की चेतावनी के बावजूद स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। सबसे शर्मनाक बात यह है कि असली मौतों के आँकड़े छिपाए गए: सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 4,81,000 कोविड मौतें दर्ज हैं, जबकि डब्ल्यूएचओ ने अनुमान लगाया कि भारत में असली मौतों की संख्या 65 लाख तक हो सकती है। भारत के अपने 2021 के नागरिक पंजीकरण आँकड़ों ने उस साल अकेले 24 लाख अतिरिक्त मौतों का खुलासा किया। इससे पता चला कि सरकारी आंकड़े छह से दस गुना तक का अंडरकाउंट है, जिसे सरकार ने बिना कोई तर्क दिए खारिज कर दिया। इस लीपापोती के कारण लाखों कोविड पीड़ितों के परिवार उस मुआवजे से वंचित रह गए, जिसके वे हक़दार थे।
*मोदी सरकार आर्थिक आँकड़े छिपाती और तोड़-मरोड़ती है*
यह लीपापोती का सिलसिला कोविड से कहीं आगे तक फैला हुआ है। मोदी सरकार पर बार-बार यह आरोप लगता रहा है कि वह प्रतिकूल आर्थिक संकेतकों को दबाती या तोड़ती-मरोड़ती है, जिससे दुनिया के मंच पर भारत के आधिकारिक आँकड़ों की विश्वसनीयता खत्म हो गई है। भरोसे का यह संकट आईएमएफ की 2025 की आर्टिकल IV समीक्षा में खुलकर सामने आया, जिसमें भारत के राष्ट्रीय लेखा-जोखा को “सी” ग्रेड दिया गया, जो आईएमएफ के चार-स्तरीय पैमाने पर दूसरा सबसे निचला दर्जा है। जब किसी सरकार के अपने आर्थिक आँकड़े, जिनमें जीडीपी के आँकड़े भी शामिल हैं, दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय संस्था के भरोसे लायक नहीं रह जाते, तो विकास का कोई भी दावा जस का तस मान लेना नामुमकिन हो जाता है।
*बढ़ती बेरोज़गारी और ठहरी हुई आय*
पिछले बारह वर्षों में बेरोज़गारी भारत के सबसे गहरे आर्थिक ज़ख्मों में से एक बन गई है। सीएमआईई के आँकड़े बताते हैं कि जून 2024 में बेरोज़गारी दर 9.2% तक पहुँच गई, जबकि युवा और स्नातकों में बेरोज़गारी दर इससे कहीं अधिक रही, और उसी महीने महिला बेरोज़गारी दर 18.5% तक जा पहुँची। 2017-18 का एनएसएसओ सर्वेक्षण, जिसे सरकार ने एक चुनाव के चलते शुरू में दबा दिया था, पहले ही 45 साल के 6.1% के उच्चतम स्तर की बेरोज़गारी उजागर कर चुका था।
बेरोज़गारी के साथ-साथ पिछले 11 साल से वेतन भी बिल्कुल नहीं बढ़े हैं। श्रम ब्यूरो के आँकड़े दिखाते हैं कि वास्तविक ग्रामीण मज़दूरी, जो 2007 से 2015 के बीच लगभग 7% सालाना की दर से बढ़ रही थी, अब लगभग शून्य वृद्धि पर आकर ठहर गई है, और 2024 में वास्तविक ग्रामीण मज़दूरी वास्तव में घट चुकी है। इसके उलट, कॉर्पोरेट मुनाफे की कहानी बिल्कुल अलग है: निफ्टी 500 कंपनियों का मुनाफा वित्त वर्ष 24 में 22.3% बढ़ा, जबकि इन्हीं कंपनियों में रोज़गार केवल 1.5% बढ़ा। इसने मोदी के उस विकास मॉडल को बेनक़ाब कर दिया है, जो पूँजीपतियों को मालामाल करता है और मज़दूरों को भूखा रखता है।
सरकार की विफलता की पराकाष्ठा यह रही कि भारत की प्रति व्यक्ति आय, जो कभी बांग्लादेश से 40% अधिक थी, 2020 में बांग्लादेश से पीछे हो गई। बांग्लादेश की 1,998 डॉलर के मुकाबले हो गई, भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 1,965 डॉलर पर अटकी रह गई। यह भारत की पिछले छह साल की सुस्त आर्थिक वृद्धि का नतीजा था। भले ही मौजूदा क़ीमतों पर भारत अब थोड़ा आगे निकल गया हो, फिर भी यह सच्चाई कि बांग्लादेश भारत के इतने क़रीब तक पहुँच गया था, इस सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन का शर्मनाक सबूत है।
*”मेक इन इंडिया” की मृगतृष्णा*
प्रधानमंत्री मोदी ने “मेक इन इंडिया” की शुरुआत करते हुए भारत को वैश्विक विनिर्माण महाशक्ति बनाने का वादा किया था। बारह साल बाद, जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी बढ़ने के बजाय वास्तव में घट गई है। 2014 में 16% से अधिक से घटकर आज यह लगभग 12% रह गई है। इसी दौरान, 2015 से मोदी सरकार ने चीन पर आयात-निर्भरता लगातार बढ़ने दी, जिसने धीरे-धीरे घरेलू उद्योगों को खोखला कर दिया। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भी, जिसमें बीस भारतीय सैनिक शहीद हुए और सैकड़ों वर्ग किलोमीटर भारतीय भूभाग पर चीन का क़ब्ज़ा हो गया, मोदी सरकार चीन से आयात बेतहाशा बढ़ाती चली गई। 2019 में लगभग 70 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 तक यह आयात लगभग 127 अरब डॉलर तक पहुँच गया। अब यह सरकार अमेरिका के साथ एक ऐसा व्यापार ढाँचा बना चुकी है, जो अमेरिकी उत्पादों, जिनमें कृषि उत्पाद भी शामिल हैं, के लिए भारतीय बाज़ार खोल देगा। यह समझौता घरेलू उद्योगों को और गहरा झटका देगा और भारत के कृषि क्षेत्र को तो संभवतः बर्बाद ही कर देगा। जैसा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बार-बार बता चुके हैं, नरेंद्र मोदी अपने कुछ क़रीबी बड़े उद्योगपतियों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए भारत के छोटे और मझोले उद्योगों को तबाह कर रहे हैं।
*पेपर लीक की महामारी*
साल-दर-साल, भारत के छात्रों को परीक्षा पेपर लीक होने की महामारी ने धोखा दिया है। नीट से लेकर राज्य-स्तरीय भर्ती और बोर्ड परीक्षाओं तक, पिछले दशक में शायद ही कोई साल ऐसा गुज़रा हो, जब पेपर लीक, परीक्षाएँ रद्द होने, और दोबारा परीक्षा कराने की खबरें न आई हों। इसने चिकित्सा, इंजीनियरिंग और सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे लाखों छात्रों के शैक्षणिक कैलेंडर और मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया है। यह कोई छोटी मोटी चूक नहीं, बल्कि संस्थागत ईमानदारी का सम्पूर्ण पतन है, मोदी सरकार ने इन परीक्षाओं का संचालन भ्रष्ट व सांप्रदायिक लोगों द्वारा चलाई जा रही संस्थाओं को जो सौंप दिया है।
देश को बार बार हुए पेपर लीकों की बहुत बड़ी मानवीय क़ीमत चुकानी पड़ी है। अकेले 2026 की नीट परीक्षा रद्द होने के बाद के छह हफ्तों में कम से कम 13 अभ्यर्थियों ने आत्महत्या कर ली। कोटा में अपनी “छात्रों की गूंज” रैली में, राहुल गांधी ने नीट अभ्यर्थी आकांक्षा चतुर्वेदी का सुसाइड नोट दिखाते हुए विद्यार्थियो से कहा,”मैं चाहता हूँ कि हम सब मिलकर यह सुनिश्चित करें कि इस देश में कोई और छात्र वह न महसूस करे, जो इस बेटी ने महसूस किया।” उन्होंने आँकड़े देते हुए बताया कि पिछले दशक में छात्रों की आत्महत्याओं में 65% की बढ़ोतरी हुई है।
राहुल गांधी ने कहा कि अकेले नीट अभ्यर्थी हर साल कोचिंग और फीस पर लगभग 1.32 लाख करोड़ रुपये खर्च करते हैं, जो लगभग भारत के पूरे शिक्षा बजट के बराबर है। पाँच प्रमुख परीक्षाओं—नीट, जेईई, यूपीएससी, एसएससी और आरआरबी के आंकड़ों का खुलासा करते हुए उन्होंने कहा कि अभ्यर्थियों हर साल अपनी तैयारी पर खर्च लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपये खर्चकरते हैं, जो राज्यों के संयुक्त शिक्षा बजट के बराबर है। उन्होंने कहा कि भारत की शिक्षा प्रणाली एक जबरन वसूली की मशीन है, जो अभ्यर्थियों को नए अवसर देने के बजाय उन्हें ठुकराने और रिजेक्ट करने के लिए बनाई गई है।
राहुल गांधी ने आगे यह भी बताया कि मोदी सरकार ने शिक्षा पर खर्च को एक दशक पहले के बजट के 4.7% से घटाकर आज महज़ 2.4% कर दिया है, और इसी दौरान लगभग एक लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार महँगे निजी संस्थानों को बढ़ावा देते हुए सार्वजनिक शिक्षा को व्यवस्थित रूप से खत्म कर रही है, जिससे गरीब और वंचित तबकों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच नामुमकिन होती जा रही है।
इस तरह, नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में सार्वजनिक शिक्षा में निवेश कम होता जा रहा है और दूसरी ओर परीक्षा माफिया की व्यवस्था पर बढ़ती पकड़ बढ़ती जा रही है। जहाँ परिवार अपने बच्चों की शिक्षा पर जीवन भर की जमा-पूँजी खर्च कर रहे हैं, वहीं सरकार ने उन्हें बेरहमी से लूट रही है। कई होनहार छात्रों का भविष्य बर्बाद हो रहा है। यह कोई प्रशासनिक विफलता नहीं है बल्कि यह एक पूरी पीढ़ी के साथ विश्वासघात है।
*देश की प्रतिष्ठा, उसका पासपोर्ट और मुद्रा—सब गिर रहे हैं*
मोदी की बार-बार होने वाली विदेश यात्राओं में विश्व नेताओं के साथ उनका अटपटा एवं नाटकीय से लगने वाला व्यवहार उन्हें उपहास का पात्र बनाता चला जा रहा है। इससे भारत की छवि मज़बूत होने के बजाय कमज़ोर हुई है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी, जब भारत ने अपना पक्ष रखने के लिए 32 देशों में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजे, तो अधिकांश सरकारों की प्रतिक्रिया ठंडी ही रही।
*सही आँकड़े झूठ नहीं बोलते*
भारतीय पासपोर्ट, जो कभी वैश्विक गतिशीलता सूचकांकों में शीर्ष पायदानों की ओर बढ़ रहा था, हेनली पासपोर्ट इंडेक्स में वर्षों से मध्यम स्तर पर सत्तर और अस्सी की रेंज में ही अटका हुआ है। वहीं दूसरी ओर, रुपया, जो 2014 में मोदी के सत्ता संभालने के समय अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले लगभग 58 पर था, अब 2026 में 95 का स्तर पार कर चुका है। यह स्वतंत्रता के बाद से मुद्रा में सबसे तीखी औरअपमानजनक गिरावट है।
*नारों, जुमलों की इस सरकार ने भारत की जनता से विश्वासघात किया है।*
नरेंद्र मोदी के बारह वर्षों के नेतृत्व में एक ही स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है: बड़े-बड़े ऐलान, उसके बाद उसे अमल में लाने में पूर्ण नाकामी। और इस नाकामी की क़ीमत चुकाने के लिए आम नागरिकों की हो रही बर्बाद ज़िंदगियाँ। नोटबंदी ने काले धन को खत्म करने का वादा किया, लेकिन दी सिर्फ़ आर्थिक तबाही। जीएसटी ने “एक देश, एक टैक्स” का वादा किया, लेकिन दिया एक ऐसा उलझनों से भरा कानून, जिसने छोटे व्यवसायों को कुचल दिया और राज्यों को दिवालिया बना दिया। “मेक इन इंडिया” ने विनिर्माण बढ़ाने का वादा किया था, लेकिन दिया एक सिकुड़ता हुआ औद्योगिक आधार जिसने भारत को उसी पड़ोसी पर निर्भर बना दिया, जो हमेशा से भारत के विरोध में रहता है। कोविड के दौरान सरकार ने निर्णायक नेतृत्व का वादा किया, लेकिन जनता को दी सामूहिक मृत्यु, जिसे तोड़े-मरोड़े गए आँकड़ों के पीछे छिपा दिया गया। एक पूरी पीढ़ी के छात्रों के भविष्य की क़ुर्बानी एक ऐसी परीक्षा व्यवस्था पर दे दी गई है, जो योग्यता पहचानने के बजाय मुनाफाखोरी के लिए चलती है। और इस सबके बीच, रुपया लगातार गिरता रहा, वेतन और आमदन एक स्तर पर ठहरे रहे, बेरोज़गारी बढ़ती रही, और भारत के अपने आर्थिक आँकड़े इतने अविश्वसनीय हो गए कि अब स्वयं आईएमएफ भी इन्हें जस का तस मानने को तैयार नहीं है।
यही है मोदी सरकार की असली विरासत: विशाल होर्डिंगों और प्राइम-टाइम टेलीविज़न पर दिखाया जा रहा विजयी राष्ट्र नहीं, बल्कि बंद पड़े स्कूलों, बेरोज़गार स्नातकों, बर्बाद हो चुके छोटे व्यवसायों, और उन शोकाकुल परिवारों का देश, जो अब भी इस सरकार के जिम्मेदारी से काम करने का इंतज़ार कर रहे हैं। जो सरकार सिर्फ़ नारों से चलती है, वह अपनी नाकामियों को कुछ देर तो छुपा सकती है पर हमेशा के लिए नहीं। आज बारह साल बाद, यह जनता के सामने यह सच्चाई आ चुकी है कि मोदी की सरकार केवल जोर शोर से उठाए जुमलों और प्रोपेगैंडा की सरकार है। उन्हें लागू करने के मामले में यह बिल्कुल नाकाम है।
*राजीव शर्मा
महासचिव एवं मुख्य प्रवक्ता, चंडीगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी*

