Monday, January 12, 2026
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नायब सरकार का ऐतिहासिक फैंसला / अब किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ नही होगी सीधी जांच तथा पूछताछ औऱ एफआईआर!*

राणा ओबराय
राष्ट्रीय खोज/भारतीय न्यूज,
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नायब सरकार का ऐतिहासिक फैंसला / अब किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ नही होगी सीधी जांच तथा पूछताछ औऱ एफआईआर!*
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हरियाणा सरकार ने भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की प्रक्रिया को लेकर बड़ा और अहम फैसला लिया है। अब किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ सीधी जांच, पूछताछ या एफआईआर नहीं हो सकेगी, जब तक कि पहले से सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी न ली जाए। इसके लिए सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) लागू कर दी है। सरकार का साफ कहना है कि यह व्यवस्था ईमानदार अधिकारियों को बेवजह की प्रताड़ना से बचाने और साथ ही जांच प्रक्रिया को एक सार व पारदर्शी बनाने के लिए लाई गई है। यह नया आदेश 2022 में जारी पुराने निर्देशों को रद्द करते हुए लागू किया है। यानी अब भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में पुरानी प्रक्रिया नहीं, बल्कि नई एसओपी के तहत ही कार्रवाई होगी। यह व्यवस्था केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की गाइड लाइंस के अनुरूप तैयार की गई है, जिन्हें हरियाणा सरकार ने पूरी तरह अपनाने का फैसला किया है। धारा 17ए के अनुसार, यदि किसी सरकारी कर्मचारी पर अपने पद पर रहते हुए लिए गए किसी फैसले या दी गई सिफारिश को लेकर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है, तो बिना सरकार की अनुमति उस पर जांच नहीं हो सकती। हालांकि, इसमें एक अहम अपवाद भी है। रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जाने (ट्रैप केस) की स्थिति में पूर्व अनुमति जरूरी नहीं होगी। ऐसे मामलों में एजेंसियां सीधे कार्रवाई कर सकेंगी।
अब जांच होगी ‘स्टेप-बाय-स्टेप’
नई एसओपी के तहत जांच की पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध (स्टेज-बाइज) बना दिया गया है। पहले शिकायत या सूचना का परीक्षण होगा। फिर यह तय किया जाएगा कि मामला धारा 17ए के दायरे में आता है या नहीं। उसके बाद संबंधित अधिकारी से लिखित रूप में अनुमति मांगी जाएगी। मंजूरी मिलने पर ही जांच या पूछताछ आगे बढ़ेगी। सरकार ने यह भी तय किया है कि एक ही खिड़की (सिंगल विंडो) के जरिए प्रस्ताव प्राप्त किए जाएंगे, ताकि फाइलें इधर-उधर न भटकें।
सरकार ने मंजूरी देने वाली अथॉरिटी के लिए भी समयसीमा तय कर दी है। सामान्य तौर पर 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। खास परिस्थितियों में इसे एक महीने और बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए लिखित कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा। इस प्रावधान का मकसद यह है कि न तो जांच बेवजह लटके और न ही अफसरों पर अनिश्चितता बनी रहे।
एसओपी में यह भी साफ किया गया है कि मंजूरी कौन देगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जांच कौन कर रहा है। अगर मामला हरियाणा स्टेट विजिलेंस एवं एंटी करप्शन ब्यूरो देख रहा है, तो मंजूरी को ‘सरकार’ माना जाएगा। प्रशासनिक अधिकारियों के मामलों में विजिलेंस को पहले मुख्य सचिव से मंजूरी लेनी होगी। अगर कोई अन्य एजेंसी जांच कर रही है, तो संबंधित अधिकारी के प्रशासनिक विभाग को ही सक्षम प्राधिकारी माना जाएगा। नई व्यवस्था केवल बड़े अधिकारियों तक सीमित नहीं है। एसओपी में यह भी कहा गया है कि तृतीय व चतुर्थ श्रेणी यानी ग्रुप-सी और ग्रुप-डी कर्मचारियों के मामलों में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी। हालांकि, विभाग अपने स्तर पर अधिकार सौंप सकते हैं, लेकिन जवाबदेही पूरी तरह प्रशासनिक विभाग की ही रहेगी।
सरकार ने साफ कर दिया है कि यह एसओपी केवल नए मामलों पर ही नहीं, बल्कि उन सभी लंबित मामलों पर भी लागू होगी, जिनमें अब तक धारा 17ए के तहत अनुमति नहीं ली गई है। यानी अब जांच एजेंसियों को हर हाल में इस नई व्यवस्था का पालन करना होगा। इस फैसले के जरिए सरकार ने दो-टूक संदेश दिया है कि ईमानदार अफसरों को डरने की जरूरत नहीं। लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को कोई राहत नहीं। सरकार का मानना है कि यह एसओपी जांच एजेंसियों की मनमानी रोकने, अफसरशाही में भरोसा बढ़ाने और कानूनी प्रक्रिया को मजबूत करने में मदद करेगी।
आम लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि अब शिकायत पर तुरंत एफआईआर नहीं होगी। पहले तथ्यों की जांच और अनुमति जरूरी होगी। लेकिन रिश्वतखोरी जैसे मामलों में कार्रवाई पहले की तरह तेज रहेगी। यानी सिस्टम अब जल्दबाज़ी नहीं, बल्कि कानून के मुताबिक संतुलित कार्रवाई की ओर बढ़ रहा है।

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